साहसी बालक की कहानी – (Sahasi Balak ki Kahani)


सुंदरपुर नाम का एक छोटा सा गांव था। उस गांव में पूर्णचन्द्र नाम का एक बालक था। वो प्रतिदिन अपने गाँव की पाठशाला में पढ़ने जाया करता था।

पाठशाला में वह खूब मन लगाकर पढाई करता था, शिक्षक जो भी कार्य देते वो घर आकर उसे समय पर पूरा कर लेता और फिर अपना कार्य समाप्त होने के बाद गांव के बच्चों के साथ खेलने लग जाता था। 

sahasi balak ki kahani
साहसी बालक की कहानी

एक दिन की बात हैं, पूर्णचन्द्र पाठशाला से आकर अपना सारा पढाई का कार्य पूरा कर लिया फिर वह दूसरे बच्चों के साथ खेलने लगा, कुछ देर खेलने के बाद वह घर आ गया। 

घर आकर उसने खाना खाया और थोड़ा आराम करने लगा, वह थका तो था ही उसे जल्दी ही गहरी नींद आ गयी, नींद में उसे कुछ लोगों के भागने और चिल्लाने की आवाज सुनाई दी।

पूर्णचन्द्र घबराकर उठ गया, उसने देखा कि सचमुच लोग भाग रहे थे, उसके गाँव में आग लग गयी थी।

आग पूरे गाँव में फैल चुकी थी, पूर्णचन्द्र के विद्यालय के नजदीक के झोपड़ी में भी आग लगी हुयी थी।

इतने में एक जलती हुई लकड़ी विद्यालय के ऊपर गिरी, पाठशाला का दरबाजा बन्द था, उसपर ताला लगा हुआ था।

पूर्णचन्द्र ने कुछ सोचा और वह एक बांस के सहारे पाठशाला की छत पर चढ़ गया, पाठशाला की छत फुस की थी।

लेकिन छत में आग पकड़ती उससे पहले ही पूर्णचन्द्र ने जलती लकड़ी नीचे फेंक दिया। लकड़ी बुझ गयी

पूर्णचन्द्र के इस साहसी कार्य ने लोगों को प्रेरित कर दिया, लोगों ने जब एक बालक को इस तरह से अपने पाठशाला की सुरक्षा करते देखा तो वो भी भागना छोड़ आग बुझाने में जुट गये।

इस तरह पूरे गाँव के लोग जो अबतक इधर से उधर भाग रहे थे। उन्होंने भागना छोड़कर आग पर पानी डालना शुरू कर दिया, और सबकी एकजुट प्रयास से देखते ही देखते आग पूरी तरह से बुझ गयी। 

इस तरह एक साहसी बालक के कारण पूरा गाँव जलने से बच गया, गाँव के लोगों ने पूर्णचन्द्र की तारीफ की, उसे पाठशाला की तरफ से इनाम मिला। और उसका सूंदर सा छोटा गांव फिर से खुशहाली से भर गया। दोस्तों यह साहसी बालक की कहानी कक्षा के बच्चों की बहुत ही प्रेरक कहानी हैं। 

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